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THE 42 MONKS OF INDIA:
A Divine Compilation of 42 Great Saints from India. The Prime Tenure of most of these personalities dates before 1950. Adding to this Group, here are some Great Personalities (अमृतस्य पुत्राः) who endeavoured a lot for Spiritual Upliftment / Awakening of the Society, whose Prime Work Tenure falls mostly in between 1950 to 2000 …. highlighting them in order of their chronological appearance.
A.C.BHAKTIVEDANTA SWAMI PRABHUPADA – He propagated The Bhakti Movement of “SRI CHAITANYA MAHAPRABHU” and spread it to the whole world. Bhakti, normally known to be the easiest way to attain God Realization, Grass-root Traditional and Quite Unfamiliar to the western world, by His herculean efforts, got absorbed by the masses and has inspired millions since then.
SRIRAM SHARMA ACHARYA – एक स्वतंत्र सेनानी, साधक एवं समाज सेवक के रूप में आचार्य जी ने अद्भुत भूमिका निभाई l वेदों के ज्ञान को अत्यंत सहज रूप में जन-सामान्य तक पहुँचाने का भगीरथ प्रयत्न किया l कर्म-कांडी आचार्यों के अनेकों कटाक्ष सहन कर के भी उन्होंने साधारण मनुष्य को वैदिक मार्ग की ओर प्रवृत्त किया, तथा उनके हृदय में वेदमाता एवं यज्ञ-विधान के प्रति आस्था का एक अनोखा बीजारोपण किया l
OSHO – This world will probably not see another such philosopher in next 500 years. No one really popularized the term MEDITATION as much as was done by the efforts of Osho alone. He extracted Meditation (ध्यान) from the clutches of systematic yogic discipline (अष्टांग योग) in order to place it to probably the most unprepared recipients of the west, through Dynamic Mediation techniques and much more. Criticized for many reasons, no one can ever challenge this Seer’s Depth & Dynamism.
DR.NARAYAN DUTT SHRIMALI – यह है, एक अति साधारण व्यक्ति की असाधारण जीवन गाथा l शायद ही अध्यात्म का कोई ऐसा क्षेत्र हो, कोई ऐसी गूढ़ विद्या हो, जो इनसे अछूता रहा हो l एक पूर्ण व्यक्तित्व l सिर्फ़ एक ही जीवन में इतनी विविधतायों का समावेश, आज उनके निर्वाण के एक दशक पश्चात भी साधक समाज को अचंभित करती है l भारतीय अध्यात्म का क्षेत्र तो बहु आयामी है, भक्ति, पूजन, कीर्तन, योग, ध्यान, जप-तप, हवन-यज्ञ और न जाने कितने ही मार्ग संतों ने, सिद्धों ने प्रतिपादित किये हैं l इस कलिकाल में उनके प्रति जन जाग्रति फैलाना निश्चित रूप के कठिन कार्य है, परन्तु, यदि कोई ऐसा मार्ग हो जिसपर चलने से सिद्धगण भी कतरायें और जिसकी पूर्व-योग्यता का स्तर ही अत्यंत कष्ट-साध्य हो, तो वह पथ हैं – “तंत्र” l इस मार्ग की इन सभी विषमतायों की उपेक्षा करते हुए, उन तंत्र विद्याओं को लुप्तता की कोख से उद्धार करने हेतु उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पण किया l तंत्र मार्ग को लोक-भोग्य बनाकर उससे सम्बंधित कुप्रथायों का उन्होंने उन्मूलन किया l अनेकों शिष्य उनकी प्रेरणा से शुद्ध तंत्र की ओर अग्रसर हुए, यद्यपि इस कार्य को सार्थक करने हेतु उन्हें व्यक्तिगत एवं सामाजिक परिपेक्ष में कई कर्म यातनाएं भोगनी पड़ी, परन्तु कोई भी परिस्थिति उनके संकल्प तो ध्वस्त न कर सकी l