****** वैखरी मध्यमा पश्यन्ति ********
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इस ब्रह्मांडमें चार प्रकार की वाणी है । वैखरी , मध्यमा , पश्यंती ओर परावाणी ।
1 वैखरी – जो कंठसे ध्वनि द्वारा शब्दसे बोली जाय और कान द्वारा सुनी जाय वो वैखरी वाणी है । मन मस्तिष्क के विचार आवेग को हम शब्दोंमें व्यक्त करें व वैखरी वाणी है । बुद्धि चातुर्य के साथ कपट वाणी भी बोली जा सकती है । क्रोध और अहंकार युक्त उग्र अभद्र वाणी भी बोली जा सकती है । किसीके कल्याण हेतु सदवाणी भी बोली जाती है । पर ये सब मन मस्तिष्क बुद्धि प्रेरित ही वाणी है । मस्तिष्क उनका केंद्र है ।
2 मध्यमा – ये रदय का भाव है । दिलसे जो मनोभाव होता है और वो हम व्यक्त करते है वो मध्यमा वाणी है । एक छोटा बच्चा का माँ को पुकार ओर एक साधक का अपने इष्टको पुकार भी मध्यमा वाणी है । ये व्यक्ति के अंदर का भाव संस्कार से प्रेरित है । रदय (अनाहत )उसका केंद्र है ।
3 पश्यन्ति – कोई शब्द ध्वनि भी नही ओर कोई भाव भी नही । बस स्वयं ही किसी व्यक्ति का आकर्षण होना या किसी स्थानके प्रति आकर्षण होना । बिना सोचे ओर बात किये स्वयम ही कोई विषय ज्ञात होना ये पश्यन्ति वाणी है । नाभि ( मणिपुर चक्र ) इसका केंद्र है । नाभि आत्मा का स्थान है ।
4 परा – जिनकी आत्मशक्ति जाग्रत हो और ब्रह्मांड की दिव्य शक्तिओ से स्वयम ही वार्तालाप हो ये परावाणी है । मंत्र , तंत्र , पूजा , होम , अनुष्ठान ये सब करते करते जब साधक की ऊर्जा पूर्ण जाग्रत होजाय तब परावाणी द्वारा वो ब्रह्मांडीय शक्तिओ से जुड़ जाता है । सहस्त्रार चक्र से भी ऊपर उनका केंद्र है ।
तंत्र-साधना स्थूल शरीर से शुरू होकर आत्मा तक की अंतरंग साधना-यात्रा है।
मनुष्य-शरीर में तीन महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उन्हीं से आत्मा का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है और उसी से जीवन हर पल संचालित रहता है। स्थूल शरीर में उन महत्वपूर्ण केंद्रों में पहला केंद्र है–‘मस्तिष्क’। मस्तिष्क का सम्बन्ध मन से है। मन का कार्य-क्षेत्र मस्तिष्क है। मस्तिष्क के लिए मन महत्वपूर्ण है। मन के माध्यम से मस्तिष्क का सम्बन्ध आत्मा से है। मस्तिष्क और आत्मा के बीच मन है। ‘हृदय’ दूसरा केंद्र है। प्राणों के माध्यम से हृदय का सम्बन्ध आत्मा से है। हृदय और आत्मा के बीच प्राण हैं।तीसरा केंद्र है–‘नाभि’। नाभि से आत्मा का सम्बन्ध सीधा है। उन दोनों के बीच किसी की मध्यस्थता नहीं है। मानव शरीर को जीवन-प्रवाह जहाँ से मिलता है, वह है–नाभि और यही कारण है कि नाभि केंद्र सबसे पहले विकसित होता है शिशु का। मानव शरीर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु ‘नाभि’ है। गर्भावस्था में इसी बिन्दु से शिशु का सम्बन्ध माता के प्राणों से, चेतना से और जीवन से जुड़ा हुआ रहता है।
मस्तिष्क और मन के संयोग से ज्ञान, बुद्धि, विवेक, प्रज्ञा और विचार का जन्म होता है। हृदय और प्राणों के संयोग से प्रेम, स्नेह, दया, कृपा, करुणा, अनुकम्पा आदि का जन्म होता है हृदय में और यही एकमात्र कारण है कि मनुष्य मस्तिष्क और हृदय पर सर्वाधिक बल देता रहता है। जितनी भी शिक्षाएं हैं, वे सब मस्तिष्क की शिक्षाएं हैं। सारा ज्ञान मस्तिष्क का ज्ञान है। नाभि पर किसी का ध्यान नहीं जाता और जाता भी है तो बहुत कम। अन्य केंद्रों से सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र नाभि को मानते हैं साधकगण। सभी प्रकार के लोगों का जीवन मस्तिष्क से हीे उलझा हुआ रहता है। मस्तिष्क की ही परिक्रमा करता रहता है वह। नाभि सम्पूर्ण शरीर का केंद्र- बिन्दु है। साधकों की साधना-धारा सर्वप्रथम मस्तिष्क से प्रारम्भ होकर हृदय-केंद्र पर आती है और वहां से आती है नाभि-केंद्र पर। नाभि-केंद्र एक ओर तो आत्मा से जुड़ी हुई है और दूसरी ओर जुड़ी हुई है– हृदय से भी। मनुष्य को प्राण-ऊर्जा प्राप्त होती है नाभि से। इसलिए कि नाभि का आतंरिक सम्बन्ध हृदय से है।
गर्भस्थ शिशु की नाभि से निकल कर एक नाड़ी जिसे योग की भाषा में ‘पीयूष नाड़ी’ कहते हैं, माता के हृदय से जुडी हुई रहती है। इसी रहस्यमयी नाड़ी के द्वारा शिशु प्राण-शक्ति और उस प्राण-शक्ति के माध्यम से जीवनीशक्ति बराबर प्राप्त करता रहता है। मानव-सभ्यता जैसे-जैसे विकसित होती गयी, वैसे-ही-वैसे मनुष्य मस्तिष्क को अधिक से अधिक महत्त्व देता चला गया। मस्तिष्क उसके लिए मुख्य हो गया। शरीर का मूल्य कम तथा मस्तिष्क का मूल्य सर्वाधिक हो गया उसकी दृष्टि में लेकिन मनुष्य को यह समझना चाहिए कि मस्तिष्क को मुख्य मानना और उसे महत्त्व देना सर्वाधिक घातक सिद्ध हो रहा है वर्तमान समय में उसके लिए–इसमें सन्देह नहीं।
यहां कही लोग है जो कहते है हमे कोई सिद्ध गुरु नही मिलते । असलमे गुरु केलिए उनकी कल्पना उनके मस्तिष्क बुद्धि की कल्पनामात्र होती है । जंहा दिल कहे उनको गुरुधारण करो और तर्क वितर्क फिलसूफ़ी छोड़कर सम्पूर्ण समर्पित होकर गुरु ही शिव है ऐसा जब भाव होता है तब सद्गुरु की पश्यंती वाणी से जो आशीर्वचन निकलते है वो जीवन उद्धारक होते है । शिव उपासना सरल भी है और कठिन भी है । स्मशान , प्रेत पिचाश , अघोर स्वरूप समज नही आता और मनमे अनेक संशय होते है । पर देहकी मृत्यु के बाद , स्मशान में अग्निदाह होता है , जहां जीवन समाप्त होता है वहासे शिवजी की दुनिया शुरू होती है । बिना शब्द , बिना ध्वनि , बिना रंग रूप अंदर की आत्मसे शिवजी के प्रति जब आकर्षित होने लगते है तब परा पश्यन्ति की समज आती है । इस परलोक 14 ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री पराम्बा की कृपा प्राप्त होती है । इसलिए बार बार हम ये सूचना देते है कि तर्क वितर्क फिलसुफि ओर महाज्ञानी बन बैठे ढोंगी लोग हमारी पोस्ट से दूर रहे । ऐसे वाहियात लोगो से वाहियात चर्चा गोष्ठी समय का व्यय ही है । मन मस्तिष्क बुद्धि तर्क वितर्क से कभी ब्रह्म को पाना असंभव है । रदय के पूर्ण भाव , पूर्ण श्रद्धा ही ब्रह्म प्राप्ति का रास्ता है ।
आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर त्रिपुरसुंदरी पराम्बा सदैव कृपा करें यही प्रार्थना सह अस्तु!